भू-स्थानिक (Geospatial) तकनीकों का समावेश स्मार्ट सिटी के विकास में क्रांतिकारी बदलाव लाता है। Geographic Information System (GIS) एवं रिमोट सेंसिंग की मदद से शहरों के डिजिटलीकरण, पर्यावरण निगरानी एवं सेवाओं के स्मार्ट प्रबंधन की क्षमता सशक्त होती है। यह अनुभाग स्मार्ट सिटी में GIS के संकल्पना, डेटा प्रकार, तकनीकी आधार और अनुप्रयोगों पर केंद्रित है।
Geographic Information System (GIS) एक सूचना प्रणाली है जो स्थानिक (spatial) और गैर-स्थानिक (non-spatial) डेटा को जोड़ती है, संग्रहित करती है, विश्लेषण करती है और मानचित्र के रूप में प्रस्तुत करती है। इसका मूल उद्देश्य भौगोलिक जगहों एवं विशेषताओं के बीच संबंधों का समझ विकसित करना है।
GIS का इतिहास 1960 के दशक से शुरू हुआ जब कंप्यूटर आधारित मानचित्रण तकनीकों का विकास शुरू हुआ। प्रारम्भ में यह प्रणाली सीमित डेटा और उपकरणों पर आधारित थी, परन्तु अब उच्च गुणवत्ता डेटा, शक्तिशाली कंप्यूटिंग और इंटरनेट के माध्यम से GIS अत्यंत सटीक एवं बहुपर्यायी बन चुका है।
चित्र: GIS के मुख्य घटक - स्थानिक और गैर-स्थानिक डेटा
GIS तकनीक की प्रमुख समस्याओं में डेटा की उच्च लागत, जटिल प्रोसेसिंग, डेटा गोपनीयता और तकनीकी कौशल की आवश्यकता शामिल हैं। साथ ही, तकनीकी निर्भरता जनसामान्य तक सेवाओं की पहुँच को सीमित कर सकती है।
स्थानिक डेटा दो मुख्य रूपों में होता है - रास्टर (Raster) और वेक्टर (Vector)। स्मार्ट सिटी में इन दोनों का विश्लेषण एवं उपयोग विभिन्न स्तरों पर किया जाता है।
| डेटा प्रकार | संरचना | उपयोग | विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| रास्टर डेटा | पिक्सेल की ग्रिड संरचना | सैटेलाइट इमेज, तापमान, ऊँचाई मापन | सरल संरचना, बड़े आकार के डेटा |
| वेक्टर डेटा | बिंदु, रेखा, बहुभुज (पॉलीगॉन) | सड़कें, इमारतें, सीमाएँ, नेटवर्क मॉडल | सटीक स्थानिक जानकारी, जटिल डेटा मानचित्रण |
डेटा संकल्प (Resolution) वह माप है कि किसी स्थान के कितने सूक्ष्म भागों की जानकारी मौजूद है। अधिक संकल्प उच्च सटीकता प्रदान करता है, किन्तु अधिक स्टोरेज की आवश्यकता होती है। तकनीकी चुनौतियों के कारण, डेटा संकल्प का चयन सावधानी से करना आवश्यक है।
रिमोट सेंसिंग (Remote Sensing) वस्तुओं और क्षेत्रों की जानकारी बिना सीधे संपर्क किये प्राप्त करने की तकनीक है। उपग्रह से प्राप्त इमेजिंग आधुनिक स्मार्ट सिटी के लिए आधारभूत डेटा स्रोत है।
चित्र: उपग्रह द्वारा स्मार्ट सिटी की रिमोट सेंसिंग
उपग्रह इमेजिंग शहर के विस्तार, मॉनिटरिंग, परिवहन नेटवर्क, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण निगरानी में तेजी और सटीकता लाती है।
डिजिटल मैपिंग से शहरों के वास्तुशिल्प, सड़क नेटवर्क, पार्किंग तथा आपातकालीन सेवाओं का वास्तविक समय में प्रबंधन संभव होता है। GPS (Global Positioning System) एवं DGPS (Differential GPS) स्थान निर्धारण के लिए अत्यंत प्रभावी तकनीकें हैं।
graph TD U[उपग्रह] --> S[GPS सिग्नल] S --> R[रिसीवर (GPS डिवाइस)] R --> D[स्थान निर्धारण] D --> A[स्मार्ट सिटी सर्विसेज] R --> DG[DGPS बेस स्टेशन] DG --> R
GPS सिग्नल उपग्रह से रिसीवर तक पहुँचने में लगने वाले समय पर आधारित होते हैं, जिससे स्थान ज्ञात किया जाता है। DGPS बेस स्टेशन GPS त्रुटि को सुधारकर सटीकता बढ़ाता है।
चरण 1: स्मार्ट सिटी प्रबंधन के लिए स्थान की जानकारी आवश्यक है। केवल गैर-स्थानिक या केवल स्थानिक डेटा पर्याप्त नहीं होता।
चरण 2: GIS में दोनों प्रकार के डेटा का संयोजन (संयुक्त विश्लेषण) बेहतर निर्णय लेने में सहायता करता है।
उत्तर: (c) स्थानिक और गैर-स्थानिक डेटा दोनों का संयोजन।
चरण 1: दूरी निकालनें का सूत्र है:
\[ d = c \times t \]
जहाँ \(d\) दूरी, \(c\) प्रकाश की गति, \(t\) समय है।
चरण 2: मूल्यों को उपरोक्त सूत्र में प्रतिस्थापित करें:
\[ d = 3 \times 10^8\, \mathrm{m/s} \times 0.067\, \mathrm{s} = 2.01 \times 10^7\, \mathrm{m} \]
उत्तर: पृथ्वी और उपग्रह के बीच की दूरी \(2.01 \times 10^7\) मीटर है।
चरण 1: उपग्रह इमेज आमतौर पर पिक्सेल (ग्रिड) ढांचे में होती है, अत: रास्टर डेटा है।
चरण 2: सड़क नेटवर्क विभिन्न बिंदुओं और रेखाओं के रूप में मॉडल किया जाता है, अत: यह वेक्टर डेटा है।
उत्तर: उपग्रह इमेज = रास्टर डेटा, सड़क नेटवर्क = वेक्टर डेटा।
चरण 1: DGPS त्रुटि निकालने के लिए सूत्र है:
\[ \Delta d = d_{gps} - d_{satellite} \]
चरण 2: त्रुटि मानांकित करें:
\[ \Delta d = 12000 - 11950 = 50\, \mathrm{मीटर} \]
चरण 3: DGPS इस 50 मीटर की त्रुटि को सुधारने हेतु बेस स्टेशन से विभिन्न संकेत भेजकर GPS को संशोधित करता है, जिससे स्थान निर्धारण में सटीकता बढ़ती है।
उत्तर: त्रुटि 50 मीटर है; DGPS द्वारा सुधार संभव।
चरण 1: आपदा प्रबंधन में खतरे के क्षेत्रों की सटीक पहचान एवं निगरानी अत्यंत आवश्यक है।
चरण 2: रिमोट सेंसिंग से प्राप्त उपग्रह डेटा द्वारा खतरे के क्षेत्र चिन्हित किए जा सकते हैं।
उत्तर: (c) रिमोट सेंसिंग डेटा के आधार पर जोखिम क्षेत्र पहचान।
When to use: स्मार्ट सिटी के पर्यावरण और निर्माण से जुड़े GIS कार्यों में।
When to use: GPS से जुड़ी प्रश्नो में अंतर स्पष्ट करना आवश्यक हो।
When to use: एन्ट्रेंस परीक्षाओं में GIS का अनुप्रयोग।
When to use: तकनीकी अवधारणाओं का विश्लेषण करते समय।
When to use: बहुविकल्पीय प्रश्नों में समय बचाने के लिए।
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